●भारत में आज़ादी के बाद से ही वनभूमि पर अतिक्रमण एक ज्वलंत समस्या है। ज़मीन की भूख, राजनीतिक हस्तक्षेप, राजनीतिक populism और संस्थागत कमज़ोरी ने इस संकट को लगातार बढ़ाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ वनों (forests) के बिना देश की खाद्य और जल सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित होगी।
●मई 2024 के NGT प्रकट रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 25 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में 1.3 मिलियन हेक्टेयर से ज़्यादा वनभूमि पर अतिक्रमण हो चुका है। असम (3,620.9 वर्ग कि.मी.) और मध्यप्रदेश (5,460.9 वर्ग कि.मी.) सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।
● वन भूमि विविध कारणों से प्रभावित हो रही है: जनसंख्या दबाव, विकास योजनाएँ (डैम, खनन, सड़कों आदि), शहरी विस्तार, अवैध कटाई और जमीन उपयोग में बदलाव।
●2006 के Forest Rights Act (वनाधिकार अधिनियम) ने कुछ सुधार किए हैं: व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार आस-पास आबादी को आवंटित किए गए हैं। लेकिन अधिनियम की प्रक्रिया कई जगह विवादित हो रही है और कुछ मामलों में राजनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल।
●वन विभाग की रिपोर्ट कहती है कि प्राकृतिक वनों के आधे से अधिक हिस्सों में पुनरुत्थान (regeneration) की दर कमज़ोर है। 2024 में केवल प्राकृतिक जंगलों से ही लगभग 18,200 हेक्टेयर वनहानी दर्ज की गई।
विश्लेषण
●अतिक्रमण न सिर्फ़ वन क्षेत्र की कमी का मामला है, बल्कि इसमें जैव विविधता (biodiversity) कम होना, मिट्टी क्षरण, और स्थानीय जल-चक्र पर विपरीत प्रभाव भी शामिल हैं।
●वनों का अपर्याप्त संरक्षण भूजल स्तरों, नदियों और झीलों की आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है, जिससे जल संकट गहराता है।
●खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित है क्योंकि जंगलों से जुड़े पारिस्थितिक सेवाएँ—जैसे मधुमक्खी-परागण, मिट्टी की उर्वरा शक्ति—कम हो रही हैं।
सुझाव / आवश्यक कदम
●स्थिर एवं पारदर्शी नीतियाँ बनानी होंगी ताकि अतिक्रमण को रोका जाए, विशेषकर उन इलाकों में जहाँ वनाधिकार अधिनियम का दुरुपयोग हो रहा हो।
●समय सीमा तय की जानी चाहिए वनाधिकार दावों की समीक्षा और निपटान के लिए, ताकि आवेदन प्रक्रिया धीमी और विवादों से मुक्त हो।
●नियंत्रण एवं निगरानी बढ़ाने की ज़रूरत है: सीमांकन (boundary pillars), वन क्षेत्र की डिजिटल मैपिंग, और नियमित सर्वेक्षण।
●स्थानीय समुदायों को सहभागी बनाएँ; उनके हितों और ज़रूरतों को शामिल करते हुए वन प्रबंधन की मॉडल विकसित होनी चाहिए।
●वन संरक्षण व पुनरुत्थान अभियानों को प्राथमिकता दें, जहाँ प्राकृतिक पुनरुत्थान को बढ़ावा मिले।
निष्कर्ष
वन भूमि पर बढ़ता अतिक्रमण न सिर्फ़ पर्यावरण का सवाल है, बल्कि यह हमारे भोजन, पानी और जीवन की मूलभूत सुरक्षा से जुड़ा है। यदि तत्काल और संपूर्ण कार्रवाई न हुई, तो इसका प्रभाव पर्यावरणीय और सामाजिक दोनों स्तरों पर दीर्घकालिक होगा।
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