“आरईटी” मॉडल से दुर्लभ वनस्पतियों के संरक्षण का अभिनव प्रयास

इंदौर बना देश का पहला जिला, जहां विलुप्तप्राय प्रजातियों पर केंद्रित संरक्षण मॉडल अपनाया गया।

प्रशांत मेश्राम, इंदौर

देशभर में वर्षों से पौधारोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन इंदौर वन मंडल ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया, क्या हम सिर्फ पौधों की संख्या बढ़ा रहे हैं या वास्तव में विलुप्त होती प्रजातियों को बचा भी रहे हैं? इसी सोच से जन्म हुआ ‘आरईटी’ (रेयर, एंडेंजर्ड एंड थ्रेटेंड) मॉडल का, जिसने इंदौर को देश में वन संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी बना दिया है।

इस अभिनव प्रयोग के प्रणेता इंदौर के वनमंडलाधिकारी (DFO) प्रदीप मिश्रा हैं। उन्होंने बताया कि ‘आरईटी’ वे देशी वृक्ष प्रजातियां हैं, जिनकी किसी क्षेत्र में उपस्थिति एक प्रतिशत से भी कम रह गई है। बीजा, हल्दू, कुल्लू, अर्जुन और अंजन जैसी प्रजातियां भले ही आज दुर्लभ दिखाई देती हों, लेकिन भूजल संरक्षण, मिट्टी की मजबूती, जैव विविधता और जलवायु संतुलन में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनके समाप्त होने से पूरा पारिस्थितिक तंत्र कमजोर पड़ जाता है।

इंदौर वन मंडल द्वारा पिछले 40 वर्षों के वर्किंग प्लान डेटा का गहन विश्लेषण किया गया। अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि वैज्ञानिक प्रबंधन की कमी, अंधाधुंध दोहन और प्राकृतिक पुनर्जनन की अनदेखी के कारण ‘आरईटी’ प्रजातियां तेजी से घटती गईं। इसी निष्कर्ष के आधार पर इनके लिए अलग और लक्षित संरक्षण मॉडल विकसित किया गया।

आरईटी’ मॉडल पारंपरिक पौधारोपण से बिल्कुल अलग है। इसमें केवल पौधे लगाने के बजाय प्रजाति-वार पहचान, गणना, सतत निगरानी और संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया है। डीएफओ प्रदीप मिश्रा के अनुसार,“यदि किसी ‘आरईटी’ पौधे की मृत्यु होती है, तो उसका तत्काल प्रतिस्थापन किया जाता है। स्थानीय जलवायु के अनुकूल देशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाती है और केवल सर्वाइवल नहीं, बल्कि प्रजाति-विशेष की नियमित निगरानी इस मॉडल की पहचान है।”

नर्सरी स्तर पर भी बड़ा परिवर्तन किया गया है। इंदौर की रेजिडेंसी नर्सरी को विशेष ‘आरईटी’ नर्सरी के रूप में विकसित किया गया है। जहां पहले करीब 2 हजार ‘आरईटी’ पौधे तैयार होते थे, अब इस संख्या को 50 हजार से अधिक तक पहुंचाने की योजना है। यह देश में पहला उदाहरण है, जहां किसी शहरी नर्सरी को दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए समर्पित किया गया है।

इस मॉडल को स्थायी और सहभागी बनाने के लिए संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को भी जोड़ा गया। 40 से अधिक समितियों को ‘आरईटी’ बीज संग्रह और माइक्रो नर्सरी का प्रशिक्षण दिया गया, जिससे संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों को आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो रहा है।

शहरी क्षेत्रों में भी इस पहल का प्रभाव दिखाई देने लगा है। स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और सरकारी परिसरों में ‘आरईटी’ पौधारोपण किया गया। होलकर साइंस कॉलेज में करीब 5 हजार ‘आरईटी’ पौधों का डेमो प्लांटेशन विकसित किया गया है। इसके सकारात्मक प्रभाव से देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय ने वन विभाग के सहयोग से ‘आरईटी’ और अन्य वनस्पतियों पर आधारित 15 घंटे का अकादमिक कोर्स शुरू करने पर सैद्धांतिक सहमति दी है, जिसके लिए शीघ्र ही एमओयू किया जाएगा।

मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा इंदौर और देवास में ‘आरईटी’ पौधारोपण, तथा देवास, उज्जैन और धार जिलों की रुचि ने यह सिद्ध कर दिया है कि इंदौर का यह मॉडल न केवल सफल है, बल्कि अन्य जिलों में दोहराने योग्य भी है।

डीएफओ प्रदीप मिश्रा के अनुसार,
इंदौर का ‘आरईटी’ मॉडल केवल एक प्रयोग नहीं, बल्कि नीति स्तर पर सोच में बदलाव, संस्थागत प्रतिबद्धता और सामुदायिक सहभागिता का जीवंत उदाहरण है। इसे भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर शुरू किया गया है, ताकि पारिस्थितिकी पर सकारात्मक प्रभाव पड़े और दुर्लभ वनस्पतियों को संरक्षित किया जा सके।”

इंदौर के वनमंडल अधिकारी प्रदीप मिश्रा

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MB Luwang
MB Luwang
Forest and Environmental reporter at The ForestTimes.

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