दिसंबर तक भारत में 8-10 नए चीतों के आने की है उम्मीद

भारत मे विलुप्त हो चुके चीतों की प्रजाति को पुनर्जीवित करने के लिए 2022 मे ‘प्रोजेक्ट चीता’ को शुरू किया गया। ‘प्रोजेक्ट चीता’ का परिणाम सकारात्मक रहा जिससे भारत मे चीतों के कुनबे को बढ़ाने मे मदद मिली। इसी क्रम मे चीतों की संख्या को और बढ़ाने के लिए भारत कुछ अफ्रीकी देशों से देश मे नए चीतों की एक खेप लाने की योजना बना रहा हैं। आसार है कि साल के अंत तक देश में 8-10 नए चीते लाने की उम्मीद है। इन चीतों को बोत्सवाना या नामीबिया से लाया जाएगा। अगले साल इतने ही चीते केन्या से भी लाने की उम्मीद हैं।

2022 मे शुरू किया गया था ‘प्रोजेक्ट चीता’

देश मे विलुप्त हो चुकी इस प्रजाति को पुन:स्थापित करने के लिए भारत मे ‘प्रोजेक्ट चीता’ जुलाई 2022 मे शुरू किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर नामीबिया से आठ अफ्रीकी चीतों को लाया गया था उसके बाद 2023 मे दक्षिण अफ्रीका से भी 12 चीते लाए गए थे। आधिकारिक रिपोर्टस के अनुसार लाए गए कुल 20 चीतों में से 11 अब तक जीवित हैं, इनमें छह मादा और पांच नर शामिल हैं।

भारत मे 26 चीतों का सफलतापूर्वक प्रजनन भी किया गया जिनमें से 16 अभी भी जंगल में पनप रहे हैं। भारत में जन्में चीतों के शावकों की जीवित रहने की दर 61% है। वही कुनो नेशनल पार्क मे जहाँ चीतों की पहले वर्ष में जीवित रहने का दर 70% था, दूसरे वर्ष में बढ़कर 85.7% हो गया।

चीतों को भा गया कूनों नेशनल पार्क का वातावरण

वर्तमान में देश में कुल 27 चीते हैं, जिनमें से 16 का जन्म भारत में ही हुआ है। सबसे अधिक चीते मध्य प्रदेश के कूनों नेशनल पार्क में रहते है उसके बाद गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य मे। चीतों को कूनो का वातावरण इतना भा गया कि वे विदेशी चीते अब पूरी तरह देशी रंग मे ढ़ल चुके हैं।पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार इस साल के अंत मे लाए जाने वाले चीतों को नए खेप को या तो कूनो या गांधीसागर या दोनों ही जगहों पर स्थानांतरित किया जाएगा।

चीतों के लिए तैयार किए जा रहे है दो नए घर

सरकार ने नए चीतों को बसाने के लिए दो नए घरों की पहचान की है। इनमें गुजरात का बन्नी घास का मैदान और मध्य प्रदेश का नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य को चुना गथा है। ऐसी संभावना है कि अगले साल केन्या से लाए जाने वाले नए चीतों गुजरात के बन्नी घास के मैदानों में छोड़ा जा सकता है।

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MB Luwang
MB Luwang
Forest and Environmental reporter at The ForestTimes.

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