‘देबरीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य’ ओडिशा का नया टाइगर रिज़र्व बनने को हैं तैयार!

देबरीगढ़ (ओडिशा)

‘देबरीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य’ भारत का नया और ओडिशा का तीसरा टाइगर रिज़र्व बनने के आखिरी चरण मे हैं, अगर आगे सब कुछ योजनाओं के मुताबिक चला तो जल्द ही ओडिशा को उसका नया टाइगर रिज़र्व मिल जाएगा और भारत को 59वां।

2023 में, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने देबरीगढ़ को टीआर के रूप में नामित किया इसके बाद राज्य सरकार ने इसे बाघ अभयारण्य से संबंधित मूल दिशाओं को पूरा करने के लिए कदम उठाने का कार्य शुरू किया गया। अब टाइगर रिजर्व अपने आवश्यक मूल्यांकन के अंतिम चरण में है, क्योंकि एक विशेषज्ञ समिति इसके कोर और बफर जोन की समीक्षा कर रही है।

ओडिशा मे अभी 2 टाइगर रिज़र्व हैं मौजूद

वर्तमान मे, ओडिशा मे 2 टाइगर रिज़र्व मौजूद हैं- पहला सिमिलिपाल टाइगर रिज़र्व जो मयूरभंज जिले मे स्थित है,राज्य के सबसे ज्यादे बाघ यही रहते है। और दूसरा भितरकनिका टाइगर रिज़र्व जो केंद्रपाड़ा जिले मे मौजूद है, यहा बाघों की संख्या मे हमेशा गिरावट देखने को मिलती हों। अगर देबरीगढ़ को बाघ अभयारण्य का दर्जा मिलता है तो यह राज्य का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व बन जाएगा।

290 वर्ग किलोमीटर मे फैला है प्रस्तावित टाइगर

बरगढ़ जिले में हीराकुंड बांध जलाशय के निकट स्थित देबरीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य कुल 346.90 वर्ग किलोमीटर है के क्षेत्रफल मे फैला हुआ हैं। प्रस्तावित टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल अभयारण्य के भीतर 290 वर्ग किलोमीटर है, जो यह मानव बस्ती से रहित है। बचे हुए 54.95 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले पर्यटन क्षेत्र टाइगर रिजर्व के दायरे से बाहर रखा गया है। वही अभयारण्य के इको-टूरिज्म हिस्से को भी टाइगर रिजर्व क्षेत्र के दायरे से बाहर रखा गया है। पिछ्ले कुछ सालों के अंदर मुख्य क्षेत्र से 445 परिवारों को स्थानांतरित किया गया हैं।

देश के कई बाघ अभयारण्यों से सटा हुआ है देबरीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य

अभयारण्य की एक अनूठी विशेषता भी है, यह मध्य और पूर्वी भारत के कई जंगलो के बार्डर पर स्थित है तथा कई राजयों के कई बाघ अभयारण्यों से सटा हुआ हैं। छत्तीसगढ़ के अचानकमार टीआर और उदंती टीआर ओर मध्य प्रदेश का कान्हा टीआर इससे सटे हुए हैं। वही तेलंगाना का कवल बाघ अभयारण्य और ओडिशा के सतकोसिया बाघ अभयारण्य और सुनाबेड़ा वन्यजीव अभयारण्य भी इससे जुड़े हुए हैं।

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MB Luwang
MB Luwang
Forest and Environmental reporter at The ForestTimes.

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