ओडिशा
ओडिशा के देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में वन्यजीवों की सुरक्षा की दृष्टि से 120 किमी तक स्टील की जालीदार बाड़ लगाने की योजना बनाई गई है। इस योजना की मदद से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम किया जा सकेगा और साथ ही अभयारण्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाएगी। यह फैसला देब्रीगढ़ को बाघ अभयारण्य का दर्जा मिलने के बाद लिया गया है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने मे मिलेगी मदद
देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य हीराकुंड बांध के पास स्थित है, जो अपने समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। जंगल की वजह से अक्सर इस क्षेत्र में वन्यजीवों की आबादी और मानवीय गतिविधियों के बीच संघर्ष देखा जाता है। अभयारण्य के अंदर और इसके आसपास के गांवों में रहने वाले लोग को अक्सर वन्यजीवों से सामना करना पड़ता है।
वन्यजीव अक्सर भोजन और पानी की तलाश में गांवों में चले जाते है, जिससे फसलों को नुकसान होता है और कभी-कभी जान-माल की हानि भी होती है। इन्ही समस्याओं का समाधान करने के लिए वन विभाग ने यह महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह जालीदार बाड़ अभयारण्य की सीमा को चिह्नित करेगी और जानवरों को गांवों में प्रवेश करने से रोकेगी।
हाल ही मे मिला है बाघ अभयारण्य का दर्जा
यह कदम देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य को बाघ अभयारण्य का दर्जा मिलने के बाद लिया गया है। जुलाई 2025 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) से मंजूरी मिलने के बाद, यह ओडिशा का तीसरा बाघ अभयारण्य बन गया है। इस नए दर्जे के साथ, अभयारण्य में बाघों के बेहतर संरक्षण और ट्रांसलोकेशन (स्थानांतरण) के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। स्टील की बाड़ बाघो के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी ताकि उन्हे मानवीय हस्तक्षेप का सामना न करना पड़े।
क्या होगा इस योजना से लाभ
इस 120 किमी लंबी बाड़ के निर्माण का कार्य वन विभाग द्वारा किया जाएगा, और इसका उद्देश्य मानव-पशु संघर्ष को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना है। यह योजना न केवल वन्यजीवों को सुरक्षा प्रदान करेगी, बल्कि स्थानीय लोगों को भी सुरक्षा का एहसास कराएगी, जो अक्सर जानवरों के हमलों से डरे रहते हैं। यह बाड़ मवेशियों को अभयारण्य में प्रवेश करने से भी रोकेगी, जिससे वन्यजीवों के लिए भोजन और आवास का संरक्षण होगा।
देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में 120 किमी स्टील की जालीदार बाड़ का निर्माण एक महत्वपूर्ण कदम है, जो मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को हल करने की दिशा में उठाया गया है। यह योजना बाघ अभयारण्य के रूप में देब्रीगढ़ की नई पहचान को और मजबूत करेगी और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक मिसाल कायम कर सकती है। यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है, तो यह ओडिशा के समृद्ध वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने में मदद करेगी।
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