“धीरा” की नई मंज़िल: गांधीसागर में चीता परिवार की आधारशिला

भारत के इतिहास में पहली बार, विलुप्त हो चुके चीते की वापसी की कहानी में अब एक नया पन्ना जुड़ रहा है। कूनो नेशनल पार्क की साहसी मादा चीता “धीरा” को मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले स्थित गांधीसागर वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी भेजा जा रहा है, जहाँ उसके दो नये साथी प्रभाष और पावक पहले से मौजूद हैं।

इस रोमांचक स्थानांतरण का लक्ष्य है—गांधीसागर में देश का दूसरा “चीता प्रजनन केंद्र” स्थापित करना और भारत में इन दुर्लभ बिल्लियों की स्थायी आबादी बनाना।

पृष्ठभूमि: भारत में चीते की वापसी

●भारत में 1952 में चीता आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित किए गए थे।

●2022 में प्रोजेक्ट चीता के तहत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीते लाकर कूनो नेशनल पार्क (श्योपुर) में बसाए गए।

●अब तक कूनो में 24 चीते हैं, जिनमें से 14 शावक भारत में जन्मे हैं, यह प्रोजेक्ट की बड़ी सफलता मानी जा रही है।

धीरा का सफ़र और तैयारी

दूरी व यात्रा: लगभग 300 किमी का सफर, विशेष रूप से डिजाइन किए गए “कस्टम क्रेट” में, ताकि सफर के दौरान चीता पूरी तरह सुरक्षित रहे।

निगरानी: धीरा पर रेडियो कॉलर लगाया गया है। रीयल-टाइम लोकेशन के लिए सैटेलाइट और ग्राउंड टीम लगातार नज़र रखेगी।

नया घर: गांधीसागर में 24×7 सुरक्षा घेरा, मजबूत बाड़, और उपयुक्त शिकार जैसे चीतल, सांभर और नीलगाय की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है।

स्थानीय वन्यजीव दल: लगभग 40 से अधिक अधिकारियों और फील्ड गार्ड की टीम लगातार गश्त कर रही है।

नये साथी: प्रभाष और पावक

●दोनों नर चीते दक्षिण अफ्रीका से आए हैं और पिछले कई महीनों से गांधीसागर में अनुकूलन की प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं।

●वन विभाग के अनुसार, दोनों की सेहत और व्यवहार प्रजनन के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।

●धीरा के आने से प्राकृतिक “मेटिंग” की संभावना बढ़ेगी, जिससे एक स्वस्थ और विविध जीन पूल तैयार होगा।

प्रोजेक्ट चीता का महत्व

जैव-विविधता की बहाली: भारत में खो चुकी प्रजाति की वापसी हमारे पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित करती है।

पर्यटन और अर्थव्यवस्था: नए प्रजनन केंद्र से मंदसौर और आसपास के इलाकों में इको-टूरिज़्म को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

वैज्ञानिक शोध: रेडियो-ट्रैकिंग, जेनेटिक स्टडी और प्रजनन पैटर्न पर दीर्घकालिक डेटा वैज्ञानिक समुदाय के लिए महत्वपूर्ण

संभावित चुनौतियाँ

अनुकूलन की कठिनाई: नए माहौल, भोजन और साथी के साथ घुलने-मिलने में समय लग सकता है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष: बढ़ती आबादी के साथ आसपास के कृषि क्षेत्र और गांवों पर दबाव बढ़ सकता है।

मौसमी बदलाव: भारी बारिश या सूखे जैसे प्राकृतिक उतार-चढ़ाव चीता की शिकार और स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं।

भविष्य की राह

●यदि गांधीसागर में प्रजनन सफल रहा तो आने वाले 5 वर्षों में स्वाभाविक रूप से पैदा हुए चीता शावकों की संख्या 10 से 15 तक पहुँच सकती है।

●यह मॉडल देश के अन्य संरक्षित क्षेत्रों—जैसे राजस्थान का मुकुंदरा और महाराष्ट्र का ताडोबा—में भी दोहराया जा सकता है।

●अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को बड़े बिल्ली प्रजातियों (big cats) के संरक्षण में अग्रणी बनाने की दिशा में यह अहम कदम साबित होगा।

निष्कर्ष

धीरा का यह कदम सिर्फ़ एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं है; यह भारत की पारिस्थितिक प्रतिष्ठा को बहाल करने की ऐतिहासिक पहल है। अगर योजना सफल होती है तो गांधीसागर आने वाले वर्षों में न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे एशिया का नया “चीता स्वर्ग” कहलाएगा

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MB Luwang
MB Luwang
Forest and Environmental reporter at The ForestTimes.

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