कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, जहाँ भारत का हरित आवरण बढ़ रहा है, वहीं प्रकाश संश्लेषण क्षमता में कमी के कारण देश के वनों का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यह गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है साथ ही जैव विविधता, लकड़ी उत्पादन, वनवासियों की आजीविका और जलवायु लक्ष्यों के लिए भी एक गंभीर खतरा है।
आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है अध्ययन
‘भारत में वर्तमान और भविष्य के जलवायु परिवर्तन परिदृश्यों के तहत पारिस्थितिकी तंत्र प्रकाश संश्लेषण दक्षता में गिरावट के कारण वन कार्बन स्टॉक का कमजोर होना’ शीर्षक से किए गए इस अध्ययन का नेतृत्व आईआईटी खड़गपुर में महासागर, नदी, वायुमंडल और भूमि विज्ञान केंद्र के प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टीपुरथ और राहुल कश्यप ने किया।
अध्ययन में कई प्रमुख निष्कर्ष सामने आए-
●भारतीय वनों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता पिछले दशक की तुलना में 5 प्रतिशत कम हो गई है।
●यह गिरावट सबसे अधिक पूर्वी हिमालय, पश्चिमी घाट और सिंधु-गंगा क्षेत्रों कें वनों में हुई है।
●जंगलों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता मे कमी आ रही है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की उनकी क्षमता कम हो रही हैं।
● मवन तापमान वृद्धि, शुष्कता, भूमि और वायुमंडलीय शुष्कता, और दावानल के प्रति कम प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शित करते हैं, केवल 16 प्रतिशत वन ही उच्च स्थायित्व प्रदर्शित करते हैं।
●जलवायु परिवर्तन और मानवजनित दबावों के कारण वनों के कार्बन सिंक के कमजोर हो रहे हैं और भविष्य मे स्थिति और गंभीर हो जाएगी।
प्रमुख शोधकर्ता प्रोफ़ेसर कुट्टीपुरथ ने कहा कि -‘वन स्वास्थ्य में गिरावट का एक बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग के कारण मिट्टी की नमी में कमी और हवा का तापमान बढ़ना है। जंगल की आग और भूस्खलन अन्य प्राकृतिक कारक हैं। हालाँकि, वनों की कटाई, खनन और अन्य विकास गतिविधियाँ भी वन स्वास्थ्य में गिरावट का कारण बनती हैं।’
वन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक कदम
अध्ययन में इस समस्या से निपटने के लिए कई तत्काल कदम उठाने की सलाह दी गई है-
●देशी वनों का संरक्षण: पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण और स्वदेशी वनों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना।
●टिकाऊ वन प्रबंधन: वनों के संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह से करना कि उनकी दीर्घकालिक सेहत बनी रहे।
●वैज्ञानिक वनरोपण: केवल संख्या बढ़ाने की बजाय, स्थानीय जलवायु और जैव विविधता के अनुकूल प्रजातियों के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से पेड़ लगाना।
●कार्बन उत्सर्जन में कमी: वनों पर कार्बन अवशोषण का बोझ कम करने के लिए उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों में तेजी लाना।
●उन्नत तकनीक का उपयोग: कार्बन कैप्चर जैसी नई तकनीकों को अपनाना, ताकि वायुमंडल से कार्बन को प्रभावी ढंग से हटाया जा सके।
●नीतिगत बदलाव: विज्ञान-आधारित नीतियों को लागू करना, जो वन प्रबंधन और जलवायु लक्ष्यों को बेहतर ढंग से एकीकृत करें।
इस चेतावनी का महत्व यह है कि यह केवल पेड़ लगाने पर ध्यान केंद्रित करने की नीति पर सवाल उठाती है और प्राकृतिक वनों के स्वास्थ्य को बहाल करने की आवश्यकता पर जोर देती है। यह भारत के 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती भी पेश करती है।
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