मानव-वन्यजीव संघर्षौं से भरा रहा यह साल

गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

साल 2025 की दहलीज पार करके हम सब साल 2026 में पहुंच चुके हैं। बीता साल बहुत सारे संघर्षो से भरा रहा…महाकुंभ भगदड़, पहलगाम अटैक, आपरेशन सिंदूर, बाढ़ त्रासदी, एयर इंडिया विमान क्रैश, जलवायु परिवर्तन, प्रदुषण, आदि।

इन सब के अलावा यह साल मानव-वन्यजीव संघर्षो से भी भरा रहा। रिपोर्ट्स के अनुसार साल 2025 में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में पिछले वर्ष(2024) के मुकाबले लगभग 15% की वृद्धि दर्ज की गई है, जोकि बेहद चिंतनीय है और इसपर रोकथाम लगाना बेहद जरूरी है।

उत्तराखंड में सबसे अधिक मामले

देश में इस साल सबसे अधिक मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले उत्तराखंड में दर्ज किए गए, जिसके बाद उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ रहे। उत्तराखंड में तो इस साल जंगली जानवरों के हमलों की घटनाओं ने पिछले सभी सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यहां सबसे अधिक मामले गुलदार, काले भालू और जंगली हाथियों के देखें गए।

सरकारी रिकॉर्डस के अनुसार इस साल उत्तराखंड में जंगली जानवरों के हमले मे 500 से अधिक लोग घायल और 45 लोगो की मौत हो चुकी है। इन आंकड़ों ने प्रशासन और राज्य सरकार की रातों की नींद हराम कर दी है। राज्य सरकार ने इसपर काबू पाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए पर इन सब के बावजूद भी मामले रूकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

क्या है मानव-वन्यजीव संघर्ष

मानव-वन्यजीव संघर्ष का मतलब है इंसानो और जंगली जानवरों के बीच आमने-सामने से टकराव होना। इस टकराव से जान-माल का खतरा तो बना ही रहता है साथ ही यह मानसिक तनाव को भी बढ़ाता है। इस संघर्ष से सबसे अधिक नुकसान किसानों को होता है। अधिकतर मामलों में देखा जाता है कि जंगली जानवर फसलों को काफी नुक्सान पहुंचाते हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुक्सान का सामना करना पड़ता है।

क्यों हो रहे हैं मानव-वन्यजीव संघर्ष

मानव-वन्यजीव संघर्ष के बढ़ रहे मामलों के कई कारण हैं:-

  • वनों की कटाई- लगातार बढ़ रहे जनसंख्या के कारण लोगो को रहने की जगह कम पड़ रही है, जिस वजह से वनों को काटकर मनुष्य अपना घर बना रहे हैं। पेड़ो के कट जाने से जानवरों को उनके रहने की जगह मे कभी हो रही है और ना चाहते हुए भी वे मानव बस्तियों में आने को मजबूर हैं।
  • भोजन-पानी की तलाश- जंगल में भोजन-पानी की कमी की वजह से अक्सर जंगली जानवर उसकी तलाश में मानव बस्तियों में आ जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले देखने को मिलते हैं।‌
  • औद्योगीकरण– बढ़ रही औद्योगीकरण के कारण वन भूमि को गैर-वन भूमि परिवर्तित कर दिया जा रहा है, जिसके कारण वन्यजीवो को उनके निवास क्षेत्र में कमी आ रही है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर रोकथाम है जरूरी

इस साल में मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामलो का आंकड़ा इतना भयावह है कि इसने सरकार और लोगों को सहमा दिया है। मानव-वन्यजीव संघर्ष में हुई यह वृद्धि दर्शाती है कि अगर हम जानवरों से उनका घर छिनेंगे तो वे भी हमारे नुक्सान करेंगे। इसलिए हमारा यह कर्तव्य है कि हम जानवरों के प्राकृतिक आवास से छेड़छाड़ न करें जिससे वे अपनी परिधि तक ही सीमित रहे।

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MB Luwang
MB Luwang
Forest and Environmental reporter at The ForestTimes.

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