बदलते मौसम में प्रकृति और मानव का गहरा संबंध

चंदेल,मणिपुर | वसंत पंचमी भारत में पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाने वाला पर्व है। ‘वसंत’ का अर्थ है ऋतु और ‘पंचमी’ का अर्थ है पाँचवाँ दिन। यह पर्व माघ मास की शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती है, जिन्हें ज्ञान, बुद्धि, कला और संगीत की देवी माना जाता है।
वसंत पंचमी के अवसर पर लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं, पीले फूलों से सजावट करते हैं और केसरिया-पीले व्यंजन बनाए जाते हैं। पीला रंग सरसों के फूलों, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक है। कई स्थानों पर बच्चों के लिए ‘विद्यारंभ’ संस्कार किया जाता है, जिसमें वे पहली बार अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं।
यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यावरणीय चेतना से भी जुड़ा हुआ है। प्राचीन सभ्यताओं—नाइल, मेसोपोटामिया, सिंधु और यूनानी ने जीवन की एकरसता को तोड़ने के लिए उत्सवों को अपनाया। वसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो पूरे उपमहाद्वीप में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है।
पंजाब और सिख समुदाय में इसे ‘बसंत ऋतु’ के रूप में पतंगबाजी के पर्व की तरह मनाया जाता है। महाराष्ट्र में नवविवाहित दंपति मंदिरों में पीले वस्त्र पहनकर दर्शन करते हैं। राजस्थान में लोग चमेली की मालाएँ पहनते हैं, जबकि बिहार में लोग देव सूर्य मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। दिल्ली में सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर भी इस दिन विशेष आयोजन होते हैं।
भारत में यह पर्व ठंड के बाद तेज धूप, सरसों के सुनहरे खेतों और प्रकृति के नवजीवन का स्वागत करता है। पतंगबाजी को स्वतंत्रता और उल्लास का प्रतीक माना जाता है। खुले आकाश में उड़ती पतंग मानव की स्वतंत्र भावना को दर्शाती है।
वसंत ऋतु प्रकृति के पुनर्जागरण का समय होती है। पेड़ों पर नई पत्तियाँ आती हैं, फूल खिलते हैं, पक्षियों की चहचहाहट बढ़ जाती है और वातावरण जीवन से भर उठता है। यह पर्व हमें प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध की याद दिलाता है।
हालाँकि, जलवायु परिवर्तन ने इस प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, वसंत ऋतु अब पहले आने लगी है, जिससे प्राकृतिक जीवन चक्र में असंतुलन पैदा हो रहा है। पिछले 50 वर्षों के अध्ययन बताते हैं कि इससे फसलों, कीटों और खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
लगभग 30 वर्षों के एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पराग (पोलन) का मौसम अब अधिक लंबा हो गया है, जिससे अस्थमा और एलर्जी जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। उत्तराखंड वन विभाग के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि रोडोडेंड्रोन, काफल, हिसालू और भेंकल जैसे पौधों में फूल और फल सामान्य समय से 3–4 महीने पहले आने लगे हैं।
प्रकृति की अपनी एक घड़ी होती है, जो ऋतुओं, पेड़-पौधों, पक्षियों और कीटों के जीवन चक्र को नियंत्रित करती है। इसमें थोड़ा सा बदलाव भी पूरे पर्यावरण पर गहरा प्रभाव डालता है। चूँकि मानव प्रकृति का ही हिस्सा है, इसलिए इसका असर मानव स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है।
वसंत पंचमी जैसे पर्व हमें प्रकृति से दोबारा जुड़ने का अवसर देते हैं। यह प्राचीन भारतीय पर्यावरण चेतना का प्रतीक है। इस दिन हमें केवल पूजा ही नहीं, बल्कि अपने जीवन-शैली विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए, ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे।
प्राचीन भारतीय जीवन-शैली स्वाभाविक रूप से पर्यावरण-अनुकूल थी। आज आवश्यकता है कि हम उसी सोच को फिर से अपनाएँ। तभी हम वसंत पंचमी के वास्तविक अर्थ को समझ पाएँगे और माँ सरस्वती के रंगों, सुगंधों और वसंत की सुंदरता को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख पाएँगे।
डॉ. एन. मुनल मैतेई
पर्यावरणविद
वर्तमान में डीएफओ, चंदेल
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