झारखंड
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में स्थित सारंडा वन को राज्य सरकार से वन्यजीव अभयारण्य बनाने की मंजूरी मिल गई है। जिसके साथ ही इस फैसले पर कई तरह के विवाद भी खड़े हो गए है। सारंडा वन के स्थानीय आदिवासी समुदाय इस फैसले के आने के बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे है और सरकार को इस फैसले को वापस लेने का आग्रह कर रहे है। उनका मानना है कि सारंडा वन का वन्यजीव अभयारण्य बनने से उनकी आजीविका प्रभावित होगी।
आखिर क्यों सारंडा को वन्यजीव अभयारण्य बनने से स्थानीय आदिवासी विरोध कर रहे?
सारंडा वन कई आदिवासी परिवारों का घर है। क्षेत्र में करीब 50 राजस्व गांव और 10 वन गांव शामिल हैं, जहां लगभग 75,000 लोग निवास करते हैं। वे अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से सारंडा वन पर निर्भर रहते है। वन से वे महुआ, साल के पत्ते, जलाऊ लकड़ी और औषधीय पौधो को जुटाते है और उसे बेचकर अपनी रोजी-रोटी चलाते है। उनका कहना है कि सारंडा वन का वन्यजीव अभयारण्य बनने से उन्हे तमाम पाबंदियों का सामना करना पड़ेगा, जो उनकी आजीविका को बुरी तरह प्रभावित करेगी और साथ ही उनकी सांस्कृतिक पहचान भी खतरे में पड़ जाएगी।
कई सालो से विवादो मे चल रहा था यह फैसला
सारंडा वन को वन्यजीव अभयारण्य बनाने की प्रकिया कई सालो से विवादो मे चल रही थी। 2022 में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने झारखंड सरकार को सारंडा वन के 400 वर्ग किमी क्षेत्र को अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने का निर्देश दिया था। हालांकि, इस प्रक्रिया को पूरा करने में राज्य सरकार की ओर से लगातार देरी हो रही थी, जिसके बाद सितंबर 2025 मे सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए नाराजगी व्यक्त और राज्य सरकार को इस मामले मे जल्द से जल्द फैसला लेने का आदेश जिया। जिसके बाद अक्टूबर 2025 मे राज्य सरकार ने इस फैसले पर अपना निर्णय लेते हुए सारंडा के 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
खनन और संरक्षण के बीच टकराव
सारंडा वन क्षेत्र लंबे समय से संरक्षणवादियों और खनन कंपनियों के बीच विवाद का केंद्र रहा है। एक तरफ, यह एशिया का सबसे बड़ा साल वन है, जो समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीवों का घर है। यहां हाथी, सांभर, चीतल और तेंदुआ जैसे कई वन्यजीव पाए जाते हैं। दूसरी तरफ, इस जंगल के नीचे लौह अयस्क और मैंगनीज जैसे खनिज भंडार हैं, जिनका दोहन खनन कंपनियां करना चाहती हैं। वन्यजीव अभयारण्य की घोषणा को संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन खनन क्षेत्र को इससे बाहर रखने का फैसला एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास है।
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