“ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने वाला वन अधिकार अधिनियम आज अधिकार, संरक्षण और राजनीति के टकराव का केंद्र बन गया है।”
प्रशांत मेश्राम, भोपाल | विगत वर्षों में भारत में वनाधिकार अधिनियम या Forest Rights Act (FRA), 2006 को आदिवासी एवं वन आश्रित समुदायों के हितों की रक्षा और उनके पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देने के लिए बनाया गया था। लेकिन अब यह कानून मूल उद्देश्य से भटककर राजनीतिक उपयोग का साधन बनता जा रहा है। यह गंभीर चिंता डॉ. वी. के. बहुगुणा ने अपनी हाल की टिप्पणी “The FRA Paradox: When a good intentional Law Becomes a Political Tool against nature” में व्यक्त की है।

डॉ. बहुगुणा के अनुसार, FRA को कभी भी विरोधाभासी रूप से नहीं समझा गया था, बल्कि इसका लक्ष्य था कि पहले से बेदखल या उपेक्षित रहने वाले जनजातीय समुदायों को उनके जंगल और संसाधनों पर वास्तविक अधिकार मिलें। इसमें सभी मुख्य राजनीतिक दलों का समर्थन था।
लेकिन आज लगभग दो दशक बाद यह कानून एक राजनीतिक उपकरण के रूप में बदल गया है। Ministry of Tribal Affairs तथा विभिन्न राज्य सरकारें इसे ऐसे मामलों में बढ़ावा दे रही हैं जहाँ पहले जंगलों पर अतिक्रमण होता है और फिर वही Gram Sabha उस अतिक्रमण को नियमित करने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाती है। यानी Gram Sabha के सदस्यों के राजनीतिक हित प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा से ऊपर उठ रहे हैं।
विशेषकर महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में इस कानून का उपयोग मतों की राजनीति के लिए ज्यादा देखने को मिला है। जहाँ यह कानून मूल रूप से “अधिकार” देने के लिए था, वहाँ अब यह “मत हासिल करने” का साधन बनता जा रहा है।
डॉ. बहुगुणा ने यह भी कहा कि कानून के लिए किसी निश्चित अंतिम तिथि का निर्धारण न होना भी एक बड़ी समस्या है। इससे बड़े पैमाने पर आवेदन दायर किये जा रहे हैं, जिनमें से कई आवेदन विवादित जंगल अतिक्रमण को वैधता देने का काम करते हैं।
उल्लेखनीय है कि FRA, 2006 का उद्देश्य था कि वन-आश्रित आदिवासी समुदायों को उनकी भूमि-भूमि और संसाधनों पर पारंपरिक अधिकार मिले और वे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील इलाकों में न्यायसंगत भागीदारी कर सकें। लेकिन अब कुछ राज्यों में यह कानून नवनिर्मित अतिक्रमण को नियमित कर देने वाला ऐवजी नये अतिक्रमण को बढ़ावा देने वाला मान लिया गया है।
विश्लेषकों की मानें तो इस विवाद के बीच सरकारों और नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे FRA को फिर से उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू करें तथा जरूरत पड़ने पर इसके कार्यान्वयन में संशोधन पर विचार करें, ताकि यह कानून अपने मूल उद्देश्य—पारंपरिक समुदायों के अधिकारों की रक्षा—पर कायम रहे और जंगलों तथा पारिस्थितिकी की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
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