अंतरराष्ट्रीय मानव बंधुता दिवस और हमारा पर्यावरण

“विभाजन पर संवाद” — शांति और पर्यावरण का साझा सूत्र

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 4 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मानव भ्रातृत्व दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2021 से आरंभ हुए इस दिवस की इस वर्ष की थीम है— “विभाजन पर संवाद”। इस दिवस का उद्देश्य अंतरधार्मिक और अंतर-सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देना है, क्योंकि पर्यावरणीय स्थिरता, शांति और सामाजिक न्याय एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। प्रकृति का क्षरण अक्सर संघर्ष, स्वार्थ और असंवेदनशीलता का परिणाम होता है। मनुष्यों के बीच एकजुटता और शांति ही हमारी साझी धरती—पृथ्वी की रक्षा का आधार है।

यह दिवस वर्ष 2019 में पोप फ्रांसिस और अल-अज़हर के ग्रैंड इमाम अहमद अल-तैयब द्वारा हस्ताक्षरित ऐतिहासिक दस्तावेज़ “विश्व शांति और साथ मिलकर रहने के लिए मानव भ्रातृत्व का दस्तावेज़” से प्रेरित है। यह दस्तावेज़ वैश्विक एकता, भाईचारे, सहिष्णुता और आपसी सम्मान को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता का प्रतीक है—चाहे व्यक्ति का धर्म, देश या संस्कृति कुछ भी हो।

मानव भ्रातृत्व का पर्यावरण संरक्षण से गहरा संबंध है। एक-दूसरे का सम्मान करने का अर्थ है हमारी साझा पृथ्वी की रक्षा करना—प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के विरुद्ध सामूहिक प्रयास करना। हम सभी एक ही मानवता का हिस्सा हैं, इसलिए वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी की रक्षा करना हमारी साझा जिम्मेदारी है। इस दिवस की स्थापना करने वाला संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव (75/200) “शांति की संस्कृति” को सतत विकास और पर्यावरणीय संरक्षण से जोड़ता है।

मानव भ्रातृत्व का विचार यह भी स्पष्ट करता है कि पर्यावरण की देखभाल एक नैतिक दायित्व है। संघर्ष और युद्ध न केवल मानव जीवन को नुकसान पहुँचाते हैं, बल्कि पर्यावरण विनाश के भी बड़े कारण हैं। भ्रातृत्व को घृणा के विरुद्ध औषधि और सतत विकास का सशक्त माध्यम माना गया है। यह स्वार्थ, उपभोक्तावाद और विनाशकारी प्रवृत्तियों से हटकर सहयोग, साझेदारी और प्राकृतिक संसाधनों के सम्मान की भावना को बढ़ावा देता है। समग्र पारिस्थितिकी (Integral Ecology) यह स्वीकार करती है कि पर्यावरणीय संकट सामाजिक संकटों से जुड़े हुए हैं और इनके समाधान के लिए समग्र दृष्टिकोण आवश्यक है।

यह दिवस हमें याद दिलाता है कि स्थायी शांति तब तक संभव नहीं है, जब तक हम उन प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करते रहेंगे जिन पर हमारा अस्तित्व टिका है। पर्यावरणीय क्षरण और जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव गरीबों, हाशिए पर खड़े समुदायों और शरणार्थियों पर पड़ता है, जिससे सामाजिक असमानता बढ़ती है और मानव भ्रातृत्व कमजोर होता है।

मानव भ्रातृत्व केवल शांति पर संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि पृथ्वी के संरक्षक के रूप में कार्य करने का आह्वान भी करता है—जैसा कि यूएनईपी की “फेथ फॉर अर्थ कोएलिशन” जैसी पहलें दर्शाती हैं। भ्रातृत्व सिर्फ हमारे आपसी व्यवहार का प्रश्न नहीं है, बल्कि हमारे पर्यावरण के प्रति हमारे दृष्टिकोण का भी विषय है। पर्यावरण हमारे साझा अस्तित्व की बुनियाद है।

जैसे हम नस्लवाद, पूर्वाग्रह और घृणा के विरुद्ध संघर्ष करते हैं, वैसे ही हमें पर्यावरणीय क्षरण के विरुद्ध भी संगठित होना होगा। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और संसाधनों की कमी की कोई सीमाएँ नहीं होतीं—ये पूरे मानव समाज को प्रभावित करती हैं। पर्यावरण संरक्षण प्रेम, करुणा और एकजुटता का कार्य है—भ्रातृत्व की सच्ची अभिव्यक्ति।

प्लास्टिक का कम उपयोग, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और जैव-विविधता की रक्षा जैसे छोटे लेकिन ठोस कदम उठाकर हम वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। कमजोर पर्यावरणीय आधार पर न तो स्थिर समाज संभव है और न ही स्थायी शांति।

विवेक, सद्भावना और सत्कर्म पृथ्वी की स्थिरता की मूल शक्तियाँ हैं। मानव अधिकारों की रक्षा, भ्रातृत्व की भावना और आपसी समझ के माध्यम से ही हम एक शांतिपूर्ण और सतत भविष्य की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
शांति को भ्रातृत्व चाहिए और भ्रातृत्व को एक स्वस्थ पृथ्वी।

आइए, संवाद से आगे बढ़कर कर्म की ओर बढ़ें, मानवता और प्रकृति—दोनों का सम्मान करें और अपने भ्रातृत्व को पृथ्वी तक विस्तारित करें, ताकि सभी के लिए एक टिकाऊ और शांतिपूर्ण विश्व सुनिश्चित किया जा सके।

(डॉ. एन. मुनल मेइतेई)
पर्यावरणविद
वर्तमान पद: डीएफ़ओ / चंदेल
ईमेल: numall@yahoo.in

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MB Luwang
MB Luwang
Forest and Environmental reporter at The ForestTimes.

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