क्या जंगल की मिट्टी प्रदूषित हो रही हैं? क्या उसमें प्लास्टिक के कण मौजूद हैं? हाल ही मे किए गए एक अध्ययन के अनुसार जंगल की मिट्टी में प्लास्टिक के कण समाए हुए हैं, जो मिट्टी को प्रदुषित और वन पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर कर रहे हैं।
प्लास्टिक प्रदुषण (माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक), अबतक इनका जिक्र सिर्फ नदियों, भूमि, सड़कों तक ही सीमित था, पर अब इसनें जंगलों को भी अपने कब्जें में लेना शुरू कर दिया हैं। जंगल जिन्हें अभी तक साफ-सुथरा और स्वच्छ माना जाता था, अब वे हर दिन प्लास्टिक के रूप मे प्रदूषण सोख रहे हैं।
यह शोध टीयू डार्मस्टाट के भूवैज्ञानिकों द्वारा किया गया जिनका अध्ययन हाल ही में ‘नेचर कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
आखिर कैसे जंगलो तक पहुंच रहे प्लास्टिक के कण?
प्लास्टिक प्रदुषण अब जंगलों में भी अपना डेरा जमाने लगे है, पर गैरत की बात तो यह है कि आखिर ये हानिकारक माइक्रोप्लास्टिक जंगल मे आते कहां से है? तो अध्ययन के अनुसार अधिकांश सूक्ष्म प्लास्टिक कें कण हवा के साथ उड़कर जंगलों में प्रवेश करते हैं और पेड़ों के पत्तों पर जमने लगते हैं। फिर बारिश और पतझड़ के कारण वे प्लास्टिक कण जंगल की मिट्टी मे समा जाते हैं और मिट्टी में प्लास्टिक प्रदुषण को बढ़ावा देते हैं।

मिट्टी में धसतें चले जा रहे है प्लास्टिक कण
एक बार मिट्टी में पहुंचने के बाद, प्लास्टिक के कण मिट्टी की सतहों मे समाते चले जा रहे हैं। पेड़ की पत्तियां टूटकर मिट्टी की सतह को और बनाती जाती है और उसके साथ प्लास्टिक कण और गहराई में धँसते चले जाते हैं।शोधकर्ताओं ने अपने शोध में चार जंगलों की मिट्टी का अध्ययन किया। अध्ययन मे यह निष्कर्ष निकला कि प्रति किलोग्राम मिट्टी में 120 से लेकर 13,000 से ज़्यादा प्लास्टिक कणों मौजूद हैं। कुछ जगहों पर प्रति वर्ग मीटर लगभग दस लाख कणों तक का भंडार दर्ज किया गया। ज्यादातर कणों का आकार 250 माइक्रोमीटर से भी कम था, जो रेत के एक कण से भी कहीं छोटा हैं।
जंगल दशकों से प्लास्टिक इकट्ठा करते आ रहे हैं
तो क्या ये प्लास्टिक कण एक ही दिन मे जंगल की मिट्टी मे समा गए?
नही। जबसे दुनिया मे प्लास्टिक का इस्तेमाल शुरू हुआ, तबसे ही जंगल चुपचाप हवा के माध्यम से प्लास्टिक के कण इकट्ठा कर रहे हैं। शोध मे मिट्टी में पाई गई प्लास्टिक कणों की मात्रा को दशकों से लगातार जमाव के कारण समझा जा सकता है।
आश्चर्य केवल मिटटी मे प्लास्टिक कणों की उपस्थिति का नहीं, बल्कि उसकी मात्रा का भी है। शोधकर्ताओं के अनुसार प्लास्टिक के मात्रा के मामले में जंगलों की मिट्टी, शहरी मिट्टी को भी टक्कर दे रही है।
प्रकृति और मनुष्य के लिए है खतरा
डा. वेबर ने कहा, “जलवायु परिवर्तन के कारण जंगल पहले से ही खतरे में हैं, और इस शोध के परिणामस्वरूप माइक्रोप्लास्टिक अब वन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक अतिरिक्त खतरा पैदा कर सकता है।”
इसमें एक मानवीय पहलू भी है। जो हवा जंगल मे प्लास्टिक प्रदुषण को बढ़ावा दे रही हैं, उसी हवा से हम सास भी लेते है। तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारी साँस के ज़रिए हमारे शरीर में कितने प्लास्टिक कण जा रहे होगें।
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