IUCN ने भारत के पहले डुगोंग संरक्षण अभ्यारण्य को दी मान्यता

तमिलनाडु

अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने अबू धाबी में आयोजित विश्व संरक्षण कांग्रेस 2025 मे तमिलनाडु की पाल्क खाड़ी में स्थित भारत के पहले डुगोंग संरक्षण अभ्यारण्य को समुद्री जैव विविधता संरक्षण के लिए एक वैश्विक मॉडल पर आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। ओमकार फाउंडेशन द्वारा प्रस्तावित इस प्रस्ताव को भारी समर्थन मिला। लगभग 98% देशों और सरकारी एजेंसियों तथा 94.8% गैर-सरकारी संगठनों, शोध संस्थानों और संगठनों ने इसके पक्ष में मतदान किया।

भारत का पहला डुगोंग संरक्षण अभ्यारण्य

भारत का पहला डुगोंग संरक्षण अभ्यारण्य तमिलनाडु के पाल्क खाड़ी के उत्तरी भाग में स्थित हैं। 448.34 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मे फैले इस क्षेत्र मे लगभग 12,250 हेक्टेयर समुद्री घासभूमि पाई जाती है, जो डुगोंग का मुख्य भोजन स्थल है। तमिलनाडु सरकार ने सितंबर 2022 मे इस क्षेत्र को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अनुसूची I के तहत डुगोंग रिज़र्व घोषित किया था।

क्या होते है डुगोंग

डुगोंग एक समुद्री शाकाहारी स्तनपायी जीव है। इसका मुख्य भोजन सीग्रास होता है, जिस वजह से इसे “सी काउ” (समुद्री गाय) के नाम से भी जाना जाता है। अपनी शांत स्वभाव और धीमी गति से चलने वाले डुगोंग समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी अधिकतर आयु 70 वर्ष तक होती है।

भारत मे यह प्रजाति तमिलनाडु की पाल्क खाड़ी, मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पाई जाती है। यह शुद्ध शाकाहारी समुद्री जीव होते है,जो पूरी तरह से सीग्रास पर निर्भर होते है। इसकी कम संख्या की वजह से IUCN ने डुगोंग को रेड लिस्ट “संवेदनशील” की श्रेणी में रखा हैं। हर साल 28 मई को विश्व डुगोंग दिवस मनाया जाता है।

क्यो जरूरी है डुगोंग का संरक्षण

अधिकारिक तौर पर भारत मे डुगोंग की संख्या घटकर लगभग 200 रह गई है, और यह संख्या लगातार कम हो रही है। यह प्रजाति भारत के जलक्षेत्र में गंभीर रूप से संकटग्रस्त है। डुगोंग समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं, उनकी उपस्थिति एक स्वस्थ समुद्री वातावरण का संकेत देती है। उनकी संख्या में लगातार गिरावट समुद्री पर्यावरण के स्वास्थ्य पर भी चिंता का विषय बन रही है।

समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलन को बनाए रखने के लिए डुगोंग को संरक्षित करना बेहद जरूरी है। तमिलनाडु सरकार मछुआरों की मदद से डुगोंग की सुरक्षा मे अहम योगदान कर रही है। वही सीग्रास के संरक्षण और पुनर्जनन पर काम हो रहा है जिससे डुगोंग के आहार मे कोई कमी न हो सके। डुगोंग का संरक्षण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बचाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं।

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MB Luwang
MB Luwang
Forest and Environmental reporter at The ForestTimes.

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